PanchTantra-टका नहीं तो टकटका भाग-5

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panchatantra-संजीवक
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पिछले अंक, PanchTantra-टका नहीं तो टकटका भाग-4 में आपने पढ़ा कि……….

एक तरह से साथ के व्यापारी सही भी थे। बैल को बचाने के लिए आदमियों का जान चली जाए तो यह भावुकता महंगी पड़ेगी। जान और माल (Goods) तो वर्धमान का भी खतरे में था। वर्धमान की समझ में उनकी बात आ गई और उसने अपने साथ चल रहे रक्षकों में से दो को संजीवक की रक्षा के लिए छोड़ दिया और सबके साथ आगे बढ़ गया।

इससे आगे भाग-5 में पढ़िए….

इधर जब रात हुई तो दोनों रक्षकों का बुरा हाल था। यह सोच कर कि पास ही जंगल है, यदि कोई शेर या चीता निकल आया तो लेने के देने पड़ जाएंगें। उन्होंने डरते-कांपते जैसे-तैसे रात बिताई और अगले दिन मथुरा की राह पकड़ी।

वहां जब वे सेठ से मिले तो उसे गढ़ कर कहानी सुना दी कि संजीवक तो आप के आने के बाद ही मर गया था। वह आप का इतना प्रिय बैल था यह सोच कर हमने उसका दाहकर्म भी कर दिया।

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